बस कुछ देर और रुकने की कसक जाने के कुछ देर पहले ही क्यों आती है?
मन उलझा है अजीब सी उलझनों में और तुम भी तो नहीं हो कि सिर टिका दूँ, तुम्हारे काँधे पर, और कस के पकड़ के तुम्हारा हाथ, बंद कर लूँ अपनी आँखें इस विश्वास के साथ कि तुम हो ना और तुम रहोगी यूँ ही हमेशा मेरे साथ…