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मैं, तुम और मौसम

वो बारिश का मौसम वो मेरी बनायीं चाय और वो तुम्हारे बनाये आलू के पकोड़े। वो सब याद है। subah आज भी कुछ वैसी ही है। चाय भी। कच्ची और फीकी। पकोड़े नहीं है मगर। कुछ आलू जरूर है जो घूर रहे हैं शायद समझते भी हैं की उन्हें काटने का कलेजा मुझमे नहीं। तुम circle थीं और मैं tangent.. हम ज़िन्दगी में बस एक बार ही मिल सकते थे।

मैं इस उम्मीद पे डूबा के तू बचा लेगा...

मैं इस उम्मीद पे डूबा के तू बचा लेगा अब इसके बाद मेरा इम्तेहान क्या लेगा ये एक मेला है वादा किसी से क्या लेगा ढलेगा दिन तो हर एक अपना रास्ता लेगा मैं बुझ गया तो हमेशा को बुझ ही जाऊंगा कोई चराग़ नहीं हूं जो फिर जला लेगा कलेजा चाहिए दुश्मन से दुश्मनी के लिए जो बे-अमल है वो बदला किसी से क्या लेगा मैं उसका हो नहीं सकता बता न देना उसे सुनेगा तो लकीरें हाथ की अपनी जला लेगा हज़ार तोड़ के आ जाऊं उस से रिश्ता वसीम मैं जानता हूं वो जब चाहेगा बुला लेगा -वसीम बरेलवी-

एक समय आएगा

एक समय आएगा जब तुम सही और गलत के बीच जूझोगी।  और इसी जद्दो-जहद में तर्क कहीं खो जायेगा।  उम्मीद है की तुम तब दिल की सुनो।

लिखूंगा

कलम लेके बैठा हूँ,  स्याही घिसने का मन है। कुछ तुम्हारी तारीफ, कुछ अपनी शिकायतें, या यूं ही कुछ बेमतलब सा लिखने का मन है। पर नाम नही लिखूंगा तुम्हारा, पन्नों को ख़बर हो जाएगी।  पन्ने तुम्हारा नाम जान जायेंगे, पन्ने मेरा नाम जान जायेंगे,  और फिर हवाओं के संग पन्ने उड़ते हुए, पलटते हुए,  एक बार तुम्हारा नाम, एक बार मेरा नाम दिखाते फिरेंगे।
काश तुझ पर भी लागू होता "सूचना का अधिकार" ऐ-जिन्दगी ! मुझे तुझसे भी कई, सवाल पूछने थे
एक कोपल सी थी वो  जब मैंने उसे देखा, आँगन में अलग ही चमक ले आयी थी  ध्यान रखता मै उसका  पास ना आने देता उन बेलों को, कुछ उनके लिपटने से जलता था और कुछ डर भी था  उसके बहक जाने का  जड़ें बहुत अलग थी हमारी  और मेरी कुछ रूढ़ि,  जमीन से जोड़े रखती कल देखा उसे काटकर उसको दरवाजा बनाने वाले हैं।